Sohamchauhan

नहीं बन रही कविता, पता न चले मांजरा
लगाई चाबियां सारी, पर खुले न दिमाग का पिंजरा

जिसमें रहतीं रचनाएं सारी, वह होने लगा था वीरान
सूना लगने लगा अभी मेरे इन काव्यों का यह मकान

पहले सूझते थे पलकों में, वैसे न सूझे आज
समझने लगा हूं खुद को अभी…

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